bhagwat geeta_कैसे मनुष्य भगवन को प्रिय हैं

कैसे मनुष्य भगवन को प्रिय हैं

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहङ्कारसे रहित, सुख द:खोंकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है-वह मुझमें अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकानोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
जिससे कोई भी जीव उद्वेगको प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहीं होता; तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिसे रहित है-वह भक्त मुझको प्रिय है ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। 

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
जो पुरुष आकांक्षासे रहित, बाहर-भीतर शुद्ध, चतुर, पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छा हुआ है-वह सब आरम्भोंका त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। 
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा । जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है॥ 
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। 
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥
जो शत्रु-मित्रमें और मान-अपमानमें सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें सम है और आसक्तिसे रहित है॥


 
तुल्यनिन्दास्तुतिौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। 
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥
जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील और जिस किसी प्रकारसे भी शरीरका निर्वाह होनेमें सदा ही सन्तुष्ट है और रहनेके स्थानमें ममता और आसक्तिसे रहित है-वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है॥
ये तु धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। 
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥
परन्तु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृतको निष्काम प्रेमभावसे सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं॥



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