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Showing posts from July, 2020

patni ka dharm kya hai _ पत्नी का धर्म क्या है

नारद जी के द्वारा पत्नी धर्म ( स्त्री धर्म ) के लक्षण एवं उसकी व्याख्या  पतिकी सेवा करना, उसके अनुकूल रहना, पतिके सम्बन्धियों को प्रसन्न रखना और सर्वदा पतिके नियमोंकी रक्षा करना—ये पतिको ही ईश्वर माननेवाली पतिवता स्त्रियोंके धर्म हैं॥ साध्वी स्त्रीको चाहिये कि झाडने-बुहारने, लीपने तथा चौक पूरने आदिसे घरको और मनोहर वस्त्राभूषणोंसे अपने शरीरको अलंकृत रखे। सामग्रियोंको साफ-सुथरी रखे ॥ अपने पतिदेवकी छोटी-बड़ी इच्छाओंको समयके अनुसार पूर्ण करे। विनय, इन्द्रिय-संयम, सत्य एवं प्रिय वचनों से प्रेमपूर्वक पतिदेवकी सेवा करे॥ जो कुछ मिल जाय, उसीमें सन्तुष्ट रहे. किसी भी वस्तुके लिये ललचावे नहीं। सभी कार्यों में चतुर एवं धर्मज्ञ हो। सत्य और प्रिय बोले। अपने कर्तव्य सावधान रहे। पवित्रता और प्रेमसे परिपूर्ण रहकर यदि पति पतित न हो तो, उसका सहवास करे॥ जो लक्ष्मीजीके समान पतिपरायणा होकर अपने पतिकी उसे साक्षात् भगवान्का स्वरूप समझकर सेवा करती है, उसके पतिदेव वैकुण्ठलोकमें भगवत्सारूप्यको प्राप्त होते हैं और वह लक्ष्मीजीके समान उनक...

varn dharm and its characteristic _ वर्ण धर्म क्या है और उसके लक्षण

नारद जी द्वारा वर्ण धर्म  और उसके लक्षण की व्याख्या  अध्ययन, अध्यापन, दान लेना, दान देना और यज्ञ करना, यज्ञ कराना-ये छ: कर्म ब्राह्मण के हैं. क्षत्रिय को दान नहीं लेना चाहिये। प्रजाकी रक्षा करनेवाले क्षत्रियका जीवन-निर्वाह ब्राह्मणके सिवा और सबसे यथायोग्य कर तथा दण्ड (जुर्माना) आदिके द्वारा होता है॥ वैश्य को सर्वदा ब्राह्मणवंशका अनुयायी रहकर, गोरक्षा, कृषि एवं व्यापारके द्वारा अपनी जीविका चलानी चाहिये। शूद्रका धर्म है द्विजातियोंकी सेवा। उसकी जीविका का निर्वाह उसका स्वामी करता है॥ ब्राह्मणके जीवन-निर्वाहके साधन चार प्रकारके हैं- वार्ता, शालीन, यायावर और शिलोञ्छन । इनमें से पीछे-पीछे की वृत्तियाँ अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हैं॥ निम्न वर्ण का पुरुष बिना आपत्तिकालक उत्तम वर्णकी वृत्तियोंका अवलम्बन न करे। क्षत्रिय दान लेना छोड़कर ब्राह्मणकी शेष पाँचों वृत्तियांका अवलम्बन ले सकता है। आपत्तिकालमें सभी सब वृत्तियोंको स्वीकार कर सकते हैं॥ ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृत-इनमेसे किसी भी वृत्तिका आश्रय ले, परन्तु श...

defination of Manav Dharm _ मानव धर्म क्या है

युधिष्ठिर के कहने पर नारद जी ने किया मानव धर्म का वर्णन युधिष्ठिर! धर्मके ये तीस लक्षण शास्त्रोंमें कहे गये हैं-सत्य, दया, तपस्या, शौच, तितिक्षा, उचितअनुचितका विचार, मनका संयम, इन्द्रियोंका संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, सन्तोष, समदर्शी महात्माओंकी सेवा, धीरे-धीरे सांसारिक भोगोंकी चेष्टासे निवृत्ति, मनुष्यके अभिमानपूर्ण प्रयत्नोंका फल उलटा ही होता है— ऐसा विचार, मौन, आत्मचिन्तन, प्राणियोंको अन्न आदिका यथायोग्य विभाजन, उनमें और विशेष करके मनुष्योंमें अपने आत्मा तथा इष्टदेवका भाव, संतोंके परम आश्रय भगवान् श्रीकृष्णके नाम गुण-लीला आदि का श्रवण, कीर्तन, स्मरण, उनक सेवा, पूजा और नमस्कार; उनके प्रति दास्य, सख्य और आत्मसमर्पण-यह तीस प्रकारका आचरण सभी मनुष्योंका परम धर्म है। इसके पालनसे सर्वात्मा भगवान् प्रसन्न होते हैं॥ धर्मराज! जिनके वंशमें अखण्डरूपसे संस्कार होते आये हैं और जिन्हें ब्रह्माजीने संस्कारके योग्य स्वीकार किया है, उन्हें द्विज कहते हैं। जन्म और कर्मसे शुद्ध द्विजोंके लिये यज्ञ, अध्ययन, दान और ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंके विशेष कर्मोंका ...

shree krishna vivah with 16108 queen _ श्रीकृष्ण का सोलह हजार रानियों के साथ विवाह

श्रीकृष्ण का सोलह हजार रानियों के साथ विवाह सत्राजित नामसे प्रसिद्ध यादवको साक्षात् भगवान् सूर्यने स्यमन्तक मणि दे रखी थी। भगवान् श्रीकृष्णने राजा उग्रसेनके लिये वह मणि माँगी। मिथिलेश्वर! सत्राजितने द्रव्यके लोभसे वह मणि नहीं दी; क्योंकि उस मणिसे प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण स्वतः प्राप्त होता रहता था। एक दिन सत्राजितका भाई प्रसेन उस मणिको अपने कण्ठमें बाँधकर सिन्धुदेशीय अश्वपर आरूढ़ हो शिकार खेलनेके लिये वनमें विचरने लगा। वहाँ एक सिंहने प्रसेनको मार डाला। फिर उस सिंहको भी जाम्बवान्ने मारा और तत्काल उस मणिको लेकर जाम्बवान् अपनी गुफामें चला गया। सत्राजित लोगोंमें यह प्रचार करने लगा कि 'मेरा भाई प्रसेन मणिको कण्ठमें धारण करके वनमें गया था, किंतु श्रीकृष्णने वहाँ उसका वध कर दिया; इसीलिये आज सबेरे वह सभा भवन में नहीं आया' ॥ भगवन पर कलङ्कका टीका लग गया। वे कुछ नागरिकों को साथ ले वन में गये। वहाँ उन्होंने पहले घोड़े सहित मरे हुए प्रसेन के और किसी दूसरेके द्वारा मारे गये सिंह के शव को पड़ा देखा। यह देखकर पदचिह्न से पता लगाते हुए वे ऋक्षराज जाम्बवान् की ...

shree krishna stuti by brahma Ji_ब्रह्माजी द्वारा श्रीराधा कृष्ण स्तुति

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ब्रह्माजी द्वारा श्रीराधा कृष्ण स्तुति अनादिमाद्यं पुरुषोत्तमोत्तमं श्रीकृष्णचन्द्र निजभक्तवत्सलम् । स्वयं त्वसंख्याण्डपतिं परात्परं राधापतिं त्वां शरणं व्रजाम्यहम्॥ गालाकनाथस्त्वमतीवलीलो लीलावतीयं निजलोकलीला । वैकुण्ठनाथोऽसि यदा त्वमेव लक्ष्मीस्तदेयं वृषभानुजा हि॥ त्व रामचन्द्रो जनकात्मजेयं भूमौ हरिस्त्वं कमलालयेयम् । यज्ञावतारोऽसि यदा तदेयं श्रीदक्षिणा स्त्री पतिपत्निमुख्यौ॥ त्वं नारसिंहोऽसि रमा हृदीयं नारायणस्त्वं च नरेण युक्तः । तदा त्वियं शान्तिरतीव साक्षाच्छायेव याता च तवानुरूपा॥ त्वं ब्रह्म चेयं प्रकृतिस्तटस्था कालो यदेमां च विदुः प्रधानम्। महान् यदा त्वं जगदङ्करोऽसि राधा तदेयं सगुणा च माया॥ यदान्तरात्मा विदितश्चतुर्भिस्तदा त्वियं लक्षणरूपवृत्तिः। यदा विराड्देहधरस्त्वमेव तदाखिलं वा भुवि धारणेयम्॥ श्यामं च गौरं विदितं द्विधा महस्तवैव साक्षात् पुरुषोत्तमोत्तम । गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम्॥ सदा पठेद् यो युगलस्तवं परं गोलोकधाम प्रवरं प्रयाति सः। इहैव सौन्दर्यसमृद्धिसिद्धयो भवन्ति तस्यापि निसर्गतः पुनः॥ ...

Radha Krishna vivah_राधा कृष्ण विवाह

ब्रह्माजी द्वारा श्रीराधा कृष्ण विवाह एक दिन नन्दजी अपने नन्दनको अङ्कमें लेकर लाड़ लड़ाते और गौएँ चराते हुए खिरकके पाससे बहुत दूर निकल गये। धीरे-धीरे भाण्डीर-वन जा पहुँचे, जो कालिन्दी-नीरका स्पर्श करके बहनेवाले तीरवर्ती शीतल समीरके झोंकेसे कम्पित हो रहा था। थोडी ही देरमें श्रीकष्णकी इच्छासे वायुका वेग अत्यन्त प्रखर हो उठा। आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित हो गया। तमाल और कदम्ब वृक्षोंके पल्लव टूट-टूटकर गिरने, उड़ने और अत्यन्त भयका उत्पादन करने लगे। उस समय महान् अन्धकार छा गया। नन्दनन्दन रोने लगे। वे पिताकी गोदमें बहुत भयभीत दिखायी देने लगे। नन्दको भी भय हो गया। वे शिशुको गोदमें लिये परमेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये ॥ उसी क्षण करोड़ों सूर्यों के समूहकी-सी  दीप्ति उदित हुई, जो सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त थी. वह क्रमश: निकट आती-सी जान पड़ी उस दीप्तिराशि के भीतर नौ नन्दोंके राजाने वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाको देखा। नन्दने तत्काल उनके सामने मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा-'राधे! ये साक्षात् पुरुषोत्तम हैं और तुम इनकी मुख्य प्राणवल्लभा हो, यह गुप्त रहस्य मैं गर्गजीके मुखसे स...

vishnu stuti in Hindi _श्रीहरि विष्णु की स्तुति हिन्दी में

श्रीहरि विष्णु की स्तुति भावार्थ जिनकी आकृति अतिशय शान्त है, जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं, जिनकी नाभिमें कमल है, जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत् के आधार हैं, जो आकाशके सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नील मेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अङ्ग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते है जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं, जो जन्म-मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं (सिरसे) प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेदके गानेवाले अङ्ग, पद, क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुरगण (कोई भी) जिनके अन्तको नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देवके लिये मेरा नमस्कार है।

Shree Vishnu ji ki stuti_ श्रीहरि विष्णु की स्तुति

श्रीहरि विष्णु की स्तुति शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं  विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।  लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं  वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः  साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।  ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥

Narad ji ki poorva janm katha in English

Devarshi Narada narrated the account of his past birth to Shrivayas Ji Naradji said- Mune! In my previous life in the previous cycle, I was a slave boy of Vedic Brahmins. He was doing Chaturmasya at one place in the Yogi Varsha Rathu. As a child, I was appointed to his service and went to Diara. Although I was a child, I still did not have any kind of fidgeting. He was away from sports and served them according to his ignorance. After receiving their permission, I used to eat the prasad in the utensils. This washed away all my sins. In this way, while serving them, my heart became pure and I became interested in worshiping Bhajan. With the grace of those Mahatmas, I would hear the beautiful stories of Shri Krishna every day. I became interested in Priyakirti Bhagavan while listening to each verse with devotion. Then my mind also got fixed in those beautiful deities. With that intelligence, I began to see this entire Satta and non-universe imaginable in my divine spirit...

Sudama Charitra - सुदामा चरित्र by नरोत्तमदास (Narottamdas)

सुदामा-चरित्र दोहा- विप्र सुदामा बसत हो, सदा आपने धाम। भीख माँगि भोजन करें, हिये जपत हरि नाम।। 1 ।। ताकी घरनी पतिव्रता, गहै वेद की रीति। सजल सुसील सबद्धि अति, पति सेवा सौं प्रीति।। 2 ।। कहो सुदामा एक दिन, कृष्ण हमारे मित्र। करत रहति उपदेश तिय, ऐसो परम विचित्र।। 3 ।। सुदामा की पत्नी कहती है- सवैया- लोचन कमल दुख मोचन तिलक भाल स्त्रबननि कुण्डल मुकुट धरे माथ है। ओढ़े पीत बसन कर में बैजयंती माल संख चक्र गदा और पह्म लिये हाथ हैं।। कहत नरोत्तम संदीपनि गुरु के पास , तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं। द्वारिका के गए हरि दारिद हरेंगे पिय, द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं।। सुदामा कहते हैं- सवैया- सिच्छक हौं सिगरे जब को तिय, ताको कहा अब देति है सिच्छा। जे तप के परलोक सुधारत, संपति की तिनके नहिं इच्छा।। मेरे हिय के पद पंकज बार हजार लै देख परीक्षा। औरत को धन चाहिए बावरि वामन को धन केवल भिच्छा।। सुदामा की पत्नी कहती है- सवैया- कोदा सवाँ जुरतो भारि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती। सीत वितीत कियो सिसयातहि, हों हठती पैं तुम्हें न हठौती।। जो जननी न ...

Shree Krishna Kavach _ श्रीकृष्ण कवच

परमदिव्य श्रीकृष्ण कवच महत्व:- यह सबकी रक्षा करने वाला परम दिव्य ‘श्रीकृष्ण-कवच’ है। इसका उपदेश भगवान् विष्णु ने अपने नाभि-कमल में विद्यमान ब्रह्माजी को दिया था। ब्रह्माजी ने शम्भु को, शम्भु ने दुर्वासा को और दुर्वासा ने नन्द-मन्दिर में आकर श्रीयशोदाजी इसका उपदेश दिया था। श्रीकृष्ण-कवच श्रीकृष्णस्ते शिरः पातु वैकुण्ठः कण्ठमेव हि। श्वेतद्वीपपतिः कर्णौ नासिकां यज्ञरूपधृक्।। नृसिंहो नेत्रयुग्मं च जिह्नां दशरथात्मजः। अधराववतात्ते तु नरनारायणावृषी।। कपोलौ पान्तु ते साक्षात् सनकाद्याः कला हरेः। भालं ते श्वेतवाराहो नारदो भ्रूलतेऽवतु।। चिबुकं कपिलः पातु दत्तात्रेय उरोऽवतु। स्कन्धौ द्वावृषभः पातु करौ मत्स्यः प्रपातु ते।। दोर्दण्डं सततं रक्षेत् पृथुः पृथुलविक्रमः। उदरं कमठः पातु नाभिं धन्वन्तरिश्च ते।। मोहिनी गुह्यदेशं च कटिं ते वामनोऽवतु। पृष्ठं परशुरामश्च तवोरू बादरायणः।। बलो जानुद्वयं पातु जंघे बुद्धः प्रपातु ते। पादौ पातु सगुल्फौ व कल्किर्धर्मपतिः प्रभु।। सर्वंरक्षाकरं दिव्यं श्रीकृष्ण कवचं परम्। इदं भगवता दत्तं ब्रह्मणे नाभिपंकजे।। ब्रह्मणा शम्भवे दत्तं शम्भुर्...

Shree Balram ji ki Stuti _ श्रीबलरामजी की स्तुति

सत्यवतीनन्दन व्यासजी द्वारा श्रीशेषजी के अवतार श्रीबलरामजी की स्तुति इस स्तुति का निम्न महत्व है- ‘‘ जो इस जगत् में सदा ही इस स्तवन का पाठ करेगा, वह श्रीहरि के परमपद को प्राप्त होगा। संसार में उसे शत्रुओं का संहार करने वाला सम्पूर्ण बल प्राप्त होगा। उसकी सदा जय होगी और वह प्रचुर धन का स्वामी होगा।’’ -ः स्तुति:- श्रीव्यास उवाच- देवाधिदेव भगवन् कामपाल नमोऽस्तु ते। नमोऽनन्ताय शेषाय साक्षाद्रामाय ते नमः।। धराधराय पूर्णाय स्वधाम्ने सीरपाणये। सहस्त्रशिरे नित्यं नमः संकर्षणाय ते।। रेवतीरमण त्वं वै बलदेवोऽच्युताग्रजः। हलायुधः प्रलम्बघ्नः पाहि मां पुरूषोत्तम।। बलाय बलभद्राय तालाड्.काय नमो नमः। नीलाम्बराय गौराय रौहिणेयाय ते नमः।। धेनुकारिर्मुष्टिकारिः कुम्भाण्डारिस्त्वमेव हि। रुक्मयरिः कूपकर्णारिः कूटारिर्बल्वलान्तकः।। कालिन्दीभेदनोऽसि त्वं हस्तिनापुरकर्षकः। द्विविदारिर्यादवेन्द्रो व्रजमण्डलमण्डलः।। कंसभ्रातृप्रहन्तासि तीर्थयात्राकरः प्रभुः। दुर्योधनगुरुः साक्षात् पाहि पाहि प्र्रभो जगत्।। जय जयाच्युत देव परात्पर स्वयमनन्त दिगन्तगतश्रुत। सुरमुनीन्द्रफणीन्द्रवरा...

Narad ji ki Katha - नारदजी की पूर्वजन्म की कथा

देवर्षि नारद ने श्रीव्यास जी को सुनाया अपने पूर्वजन्म का वृत्तान्त नारदजी ने कहा- मुने! पिछले कल्प में अपने पूर्वजीवन में मैं वेदवादी ब्राह्मणों की एक दासी का लड़का था। वे योगी वर्षाऋतु में एक स्थान पर चातुर्मास्य कर रहे थे। बचपन में ही मैं उनकी सेवा में नियुक्त कर दियरा गया था।  मैं यद्यपि बालक था, फिर भी किसी प्रकार की चंचलता नहीं करता था। खेल-कूद से दूर रहता था और आज्ञानुसार उनकी सेवा करता था। उनकी अनुमति प्राप्त करके बर्तनों में लगा हुआ प्रसाद मैं खा लिया करता था। इससे मेरे सारे पाप धुल गये। इस प्रकार उनकी सेवा करते करते मेरा हृदय शुद्ध हो गया और भजन-पूजन में मेरी रूचि हो गयी। उन महात्माओं के अनुग्रह से मैं प्रतिदिन श्रीकृष्ण की मनोहर कथाएँ सुना करता। श्रद्धापूर्वक एक-एक पद श्रवण करते-करते प्रियकीर्ति भगवान् में मेरी रूचि हो गयी। तब उन मनोहरकीर्ति प्रभु में मेरी बुद्धि भी निश्चल हो गयी। उस बुद्धि से मैं इस सम्पूर्ण सत् और असत् जगत को अपने परब्रह्मस्वरूप आत्मा में कल्पित देखने लगा।अब चित्त के रजोगुण और तमोगुण को नाश करने वाली भक्ति का मेरे हृ...

golok dham - गोलोकधाम दर्शन (श्रीकृष्ण एवं श्रीराधिकाजी दर्शन)

गोलोकधाम दर्शन गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् बहुत पहले की बात है - दानव, दैत्य, आसुर स्वभाव के मनुष्य और दुष्ट राजाओं के भार से अत्यन्त पीड़ित हो, पृथ्वी गौ का रूप धारण करके, अनाथ की भाँति रोती-बिलखती हुई अपनी आन्तरिक व्यथा निवेदन करने के लिए ब्रह्माजी की शरण में गई। उस समय उसका शरीर काँप रहा था। वहाँ उसकी कष्टकथा सुनकर ब्रह्माजी ने उसे धीरज बँधाया और तत्काल समस्त देवताओं तथा शिवजी को साथ लेकर वे भगवान नारायण के वैकुण्ठ धाम में गये।  वहाँ जाकर ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु को प्रणाम करके अपना सारा अभिप्राय निवेदन किया।  तब भगवान विष्णु ने कहा - ब्रह्मन्! साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही अगणित ब्रह्माण्डों के स्वामी, परमेश्वर, अखण्डस्वरूप तथा देवातीत हैं। उनकी लीलाएँ अनन्त एवं अनिर्वचनीय हैं। उनकी कृपा के बिना यह कार्य कदापि सिद्ध नहीं होगा, अतः तुम उन्हीं के अविनाशी एवं परम उज्जवल धाम में शीघ्र जाओं। श्रीब्रह्माजी बोले- प्रभो! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा भी परिपूर्णतम् तत्व है, यह मैं नहीं जानता। यदि कोई दूसरा भी आपसे उत्कृष्ट परमेश्वर है, तो ...

importance of bhagavad - स्वयं श्री भगवान के श्री मुख से ब्रह्मा जी को उपदेश

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श्रीमद्भागवत् - माहात्म्य श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं लोकविश्रुतम्। शृणुयाच्छ्रद्धया युक्तो मम सन्तोषकारणम्।। लोकविख्यात श्रीमद्भागवत नामक पुराण का प्रतिदिन श्रद्धायुक्त होकर श्रवण करना चाहिए। यही मेरे सन्तोष का कारण है। नित्यं भागवतं यस्तु पुराणं पठते नरः। प्रत्यक्षरं भवेत्तस्य कपिलादानं फलम्।। जो मनुष्य प्रतिदिन भागवत पुराण का पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षर के उच्चारण के साथ कपिला गौ दान देने का पुण्य प्राप्त होता है। श्लोकार्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम्। पठते शृणुयाद् यस्तु गोसहस्त्रफलं लभेत्।। जो प्रतिदिन भागवत के आधे श्लोक या चैथाई श्लोक का पाठ अथवा श्रवण करता है, उसे एक हजार गोै दान का फल मिलता है। यः पठेत् प्रयतो नित्यं श्लोकं भागवतं सुत। अष्टादशपुराणानां फलमाप्नोति मानवः।। पुत्र ! जो प्रतिदिन पवित्रचित्त होकर भागवत के एक श्लोक का पाठ करता है, वह मनुष्य अठारह पुराणों के पाठ का फल पा लेता है। नित्यं मम कथा यत्र तत्र तिष्ठन्ति वैष्णवाः। कलिबाह्या नरास्ते वै येऽर्चयन्ति सदा मम।। जहाँ नित्य मेरी कथा होती है, वहाँ ...

chatushloki bhagwat - चतुःश्लोकी भागवत

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इस चतुःश्लोकी भागवत का उपदेश स्वयं श्री भगवान् ने ब्रह्माजी को दिया चतुःश्लोकी भागवत अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्।। 1 ।। सृष्टि के पूर्व केवल मैं ही मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म था और न तो दोनों का कारण अज्ञान। जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं ही मैं हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ हो रहा है, वह भी मैं हूँ, और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हँू। ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः।। 2 ।। वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चन्द्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश मण्डल के नक्षत्रों में राहू की भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझनी चाहिए। यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्।। 3 ।। जैसे प्राणियों के पंचभूतरचित छोटे-बड़े शरीरों में आकाश आदि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्...