shree krishna vivah with 16108 queen _ श्रीकृष्ण का सोलह हजार रानियों के साथ विवाह
श्रीकृष्ण का सोलह हजार रानियों के साथ विवाह
सत्राजित नामसे प्रसिद्ध यादवको साक्षात् भगवान् सूर्यने स्यमन्तक मणि दे रखी थी। भगवान् श्रीकृष्णने राजा उग्रसेनके लिये वह मणि माँगी। मिथिलेश्वर! सत्राजितने द्रव्यके लोभसे वह मणि नहीं दी; क्योंकि उस मणिसे प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण स्वतः प्राप्त होता रहता था। एक दिन सत्राजितका भाई प्रसेन उस मणिको अपने कण्ठमें बाँधकर सिन्धुदेशीय अश्वपर आरूढ़ हो शिकार खेलनेके लिये वनमें विचरने लगा।
वहाँ एक सिंहने प्रसेनको मार डाला। फिर उस सिंहको
भी जाम्बवान्ने मारा और तत्काल उस मणिको लेकर जाम्बवान् अपनी गुफामें चला गया। सत्राजित लोगोंमें यह प्रचार करने लगा कि 'मेरा भाई प्रसेन मणिको कण्ठमें धारण करके वनमें गया था, किंतु श्रीकृष्णने वहाँ उसका वध कर दिया; इसीलिये आज सबेरे वह सभा भवन में नहीं आया' ॥
भगवन पर कलङ्कका टीका लग गया। वे कुछ नागरिकों को साथ ले वन में गये। वहाँ उन्होंने पहले घोड़े सहित मरे हुए प्रसेन के और किसी दूसरेके द्वारा मारे गये सिंह के शव को पड़ा देखा। यह देखकर पदचिह्न से पता लगाते हुए वे ऋक्षराज जाम्बवान् की गुफातक पहुँच गये। फिर वहाँ से मणि लानेके लिये साक्षात् श्रीहरि ने गुफाके भीतर प्रवेश करके अट्ठाईस दिनों तक युद्ध किया तथा ऋक्षराज जाम्बवान् पर विजय पायी। जाम्बवान्ने अपनी सुन्दरी कन्या जाम्बवती को उस मणिके साथ श्रीहरिके हाथमें दे दिया। उसे लेकर भगवान् द्वारकामें लौटे। उन्होंने सत्राजित को मणि दे दी और स्वयं कलङ्क से मुक्त हुए। सत्राजित को अपने कृत्य पर बड़ा लज्जा आयी और वे मुँह नीचे किये भयभीत-से रहने लगे। उन्होंने यादव-परिवार में शान्ति रखनेके लिये अपनी पुत्री सत्यभामा तथा उस मणिका भी भगवान् के चरणोंमें अर्पित कर दिया॥
तदनन्तर बन्धुवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवोंकी सहायताके लिये इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) गये। उन्होंने वर्षाके चार महीने वहीं व्यतीत किये। एक दिन गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ रथपर आरूढ़ हो श्रीहरि निर्मल नीरसे भरी हुई यमुनाके तीरपर शिकार खेलनेके लिये विचरने लगे। वहाँ साक्षात् कालिन्दी देवी भगवान् श्रीकृष्णको पतिरूप में प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या कर रही थीं। पाण्डव अर्जुन ने उन्हें श्रीकृष्णको दिखाया। फिर वे भगवान् उन्हें साथ लेकर इन्द्रप्रस्थ आये। वहाँसे द्वारकामें पहुँचकर उन्होंने मनोहराङ्गी सूर्यकन्या कालिन्दीके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। उस समय परम मङ्गलमय उत्सव का विस्तारके साथ आयोजन किया गया था॥
अवन्तीके नरेशकी एक पुत्री थी, जो रूप-लावण्य से मनको हर लेनेवाली थी। उसका नाम था मित्रविन्दा। भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीकी ही भाँति मित्रविन्दाको भी स्वयंवरसे हर लाये॥
राजा नग्नजित् के एक पुत्री थी, जो लोगोंमें सत्याके नामसे विख्यात थी। उसके विवाहके लिये राजाने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'सात साँड़ोंको जो एक साथ ही नाथ देगा, उसी वीरको मैं अपनी पुत्री दूंगा।' भगवान् श्रीकृष्णने सब लोगोंके देखते-देखते उन सातों साँड़ोंको नाथकर सत्याके साथ विवाह किया॥
केकय राजकुमारी भद्राको भी भगवान् श्रीहरि उसकी इच्छाके अनुसार अपने घर ले आये। वहाँ कालिन्दीकी ही भाँति भद्राके साथ उन्होंने विधि विवाह किया॥
राजा बृहत्सेन के एक पुत्री थी, जिसे लोग लक्ष्मणा कहते थे। वह समस्त शुभ लक्षणों से सस थी। उसके यहाँ स्वयंवर में मत्स्यवेध की शर्त रखी गयी थी। भगवान्ने उस मत्स्य का भेदन किया और अपने ऊपर आक्रमण करने वाले शत्रुओं को परास्त करके लक्ष्मणा का हाथ पकड़ा ॥
सोलह हजार एक सौ राजकुमारियाँ भौमासुरके कारागारमें बंद थीं। भगवान्ने भौमासुरका वध करके उसकी कैदसे उनको छुड़ाया। उन चारुदर्शना युवतियोंकी इच्छा देखकर वे उन्हें अपने साथ ले आये॥
एक ही मुहूर्तमें विभिन्न भवनोंमें रहती हुई उन युवतियोंके साथ अपनी मायासे उतने ही रूप धारण करके भगवान्ने उन सबका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। इस प्रकार सोलह हजार एक सौ आठ रानियों में से प्रत्येक ने श्रीकृष्णके दस-दस पुत्र उत्पन्न किये। वे सभी गुणों में पिताके समान थे॥
भीष्मककन्या रुक्मिणीके गर्भसे सबसे पहले प्रद्युम्न प्रकट हुए। वे कामदेवके अवतार थे और पिताकी ही भाँति समस्त शुभलक्षणोंसे विभूषित थे।
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