Posts

Showing posts from August, 2020

bhagwat geeta_कैसे मनुष्य भगवन को प्रिय हैं

कैसे मनुष्य भगवन को प्रिय हैं अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहङ्कारसे रहित, सुख द:खोंकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है-वह मुझमें अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकानोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ जिससे कोई भी जीव उद्वेगको प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहीं होता; तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिसे रहित है-वह भक्त मुझको प्रिय है ॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।  सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ जो पुरुष आकांक्षासे रहित, बाहर-भीतर शुद्ध, चतुर, पक्षपातसे रहित और ...

Krishnastkam_कृष्णाष्टकम्

शंकराचार्य विरचितं श्री कृष्णाष्टकम् वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम् । दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम् ॥१॥ अतसी पुष्प सङ्काशं हार नूपुर शॊभितम् । रत्न कङ्कण कॆयूरं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम् ॥२॥ कुटिलालक संयुक्तं पूर्णचन्द्र निभाननम् । विलसत् कुण्डलधरं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरम् ॥३॥ मन्दार गन्ध संयुक्तं चारुहासं चतुर्भुजम् । बर्हि पिञ्छाव चूडाङ्गं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ४ ॥ उत्फुल्ल पद्मपत्राक्षं नील जीमूत सन्निभम् । यादवानां शिरॊरत्नं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम् ॥५॥ रुक्मिणी कॆलि संयुक्तं पीताम्बर सुशॊभितम् । अवाप्त तुलसी गन्धं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम् ॥६॥ गॊपिकानां कुचद्वन्द कुङ्कुमाङ्कित वक्षसम् । श्रीनिकॆतं महॆष्वासं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम् ॥७॥ श्रीवत्साङ्कं महॊरस्कं वनमाला विराजितम् । शङ्खचक्र धरं दॆवं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम् ॥८॥ || इति श्री कृष्णाष्टकम् ||

Vatsasur Udhdhar by Shree Krishan_श्री कृष्णा द्वारा वत्सासुर का उद्धार

श्री कृष्णा द्वारा वत्सासुर का उद्धार एवं पूर्वजन्म की कथा  नारद जी बोले- एक दिन उनके बछड़ोंके झुंडमें कंसका भेजा हुआ वत्सासुर आकर मिल गया। श्रीकृष्णको या बात विदित हो गयी और वे उसके पास गये। वर दैत्य गोप-बालकोंके बीचमें सब ओर पूँछ उठाकर बार-बार दौड़ता हुआ दिखायी देता था। उसने अचानक आकर अपने पिछले पैरोंसे श्रीकृष्णके कंधोंपर प्रहार किया। अन्य गोप-बालक तो भाग चले, किंतु श्रीकृष्णने उसके दोनों पैर पकड़ लिये और । उसे घुमाकर धरतीपर पटक दिया। इसके बाद श्रीहरि ने फिर उसे हाथोंसे उठाकर कपित्थ-वृक्षपर दे मारा। फिर तो वह दैत्य तत्काल मर गया। उसके धक्केसे महान् कपित्थ-वृक्षने स्वयं गिरकर दूसरे-दूसरे वृक्षों को भी धराशायी कर दिया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई। समस्त ग्वालबाल आश्चर्यसे चकित हो कन्हैयाको वहाँ साधुवाद देने लगे। देवतालोग आकाश में खडे हो जय-जयकार करते हुए फूल बरसाने लगे। उस दैत्यकी विशाल ज्योति श्रीकृष्णमें लीन हो गयी॥ बहुलाश्वने पूछा- मुने! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है। बताइये तो, इस वत्सासुरके रूपमें पहलेका कौन-सा पुण्यात्मा पुरुष प्रकट हो गया था, जो परिपूर्णतम परमा...

govardhan ka braj me aana _ गोवर्धन का बृज में आगमन

गोवर्धन का बृज में आगमन  एक समय मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यजी तीर्थयात्राके लिये भूतलपर भ्रमण करने लगे। उन महामनिव द्रोणाचलके पुत्र श्यामवर्णवाले श्रेष्ठ पर्वत गोवर्धन देखा, जिसके ऊपर माधवी लताके सुमन सुशोभित हो रहे थे। वहाँके वृक्ष फलोंके भारसे लदे हुए थे। निर्झरोंके झर-झर शब्द वहाँ गूंज रहे थे। उस पर्वतपा बड़ी शान्ति विराज रही थी। अपनी कन्दराओंके कारण वह मङ्गलका धाम जान पड़ता था। सैकड़ों शिखरोंसे सुशोभित वह रत्नमय मनोहर शैल तपस्या करनेके लिये उपयुक्त स्थान था। मुनिवर पुलस्त्यके मनमें उस पर्वतको प्राप्त करनेकी इच्छा हुई। इसके लिये वे द्रोणाचलके समीप गये। द्रोणगिरिने उनका पूजन-स्वागत-सत्कार किया। इसके बाद पुलस्त्यजी उस पर्वतसे बोले। पुलस्त्यने कहा- द्रोण! तुम पर्वतोंके स्वामी हो। समस्त देवता तुम्हारा समादर करते हैं। तुम दिव्य ओषधियोंसे सम्पन्न और मनुष्योंको सदा जीवन देनेवाले हो। मैं काशीका निवासी मुनि हूँ और तुम्हारे निकट याचक होकर आया हूँ। तुम अपने पुत्र गोवर्धनको मुझे दे दो। यहाँ अन्य वस्तुओंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। भगवान् विश्वेश्वरकी महानगरी काशी' नामसे प्रसिद्...

origin of Govardhan _ गोवर्धन पर्वत की उत्पत्ति

गिरिराज गोवर्धन की उत्पत्ति  नन्दजीने पूछा- महाप्राज्ञ सन्नन्दजी! आप सर्वज्ञ और बहुश्रुत हैं, मैंने आपके मुखसे व्रजमण्डलके माहात्म्यका वर्णन सुना। अब 'गोवर्धन' नामसे प्रसिद्ध जो पर्वत है, उसकी उत्पत्ति कैसे हुई–यह मुझे बताइये। इस गिरिश्रेष्ठ गोवर्धनको लोग 'गिरिराज' क्यों कहते हैं? यह साक्षात् यमुना नदी किस लोकसे यहाँ आयी है? उसका माहात्म्य भी मुझसे कहिये; क्योंकि आप ज्ञानियोंके शिरोमणि हैं। सन्नन्दजी बोले- एक समयकी बात है, हस्तिनापुरमें महाराज पाण्डुने धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीभीष्मजीसे ऐसा ही प्रश्न किया था। उनके उस प्रश्नको और भीष्मजीद्वारा दिये गये उत्तरको अन्य बहुत-से लोग भी सुन रहे थे। (उस समय भीष्मजीने जो उत्तर दिया, वही मैं यहाँ सुना रहा हूँ-) साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण, जो असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति, गोलोकके नाथ और सब कुछ करने में समर्थ हैं, जब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये स्वयं इस भूतलपर पधारने लगे, तब उन जनार्दन देवने अपनी प्राणवल्लभा राधासे कहा-प्रिये! तुम मेरे वियोगसे भयभीत रहती हो, अतः भीरु! तुम भी भूतलपर चलो' ॥ ...

View of Golok Dham of Shree Krishna in English Translation

Golokdham Darshan               It was a long time ago - the demon, the demon, the man of distress and the wicked kings are very much afflicted, the earth, taking the form of cow, weeping like an orphan, went to the shelter of Brahmaji to request his inner agony. . His body was shivering at that time. Hearing his plight there, Brahma ji endured him and immediately went to Vaikunth Dham of Lord Narayana with all the gods and Shiva.               After going there, Brahmaji bowed to Lord Vishnu and requested all his intentions. Then Lord Vishnu said - Brahm! Only Lord Krishna is the Lord of the infinite universe, God, AkhandSwaroop and Devasta. His pastimes are eternal and inexpressible. Without his grace this work will never be proved, so you should go to his imperishable and supremely bright abode soon.              SriBrahmaji said- God I do not know any other element...

Bhawat Geeta importance _ श्रीमद्भगवद्रीतामाहात्म्यम्

Image
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥ अथ श्रीमद्भगवद्रीतामाहात्म्यम् गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतः पुमान्। विष्णोः पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जितः॥१॥ गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च। नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च॥२॥ मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने। सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्॥३॥ गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥४॥ भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनिःसृतम्। गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥५॥ सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥६॥ एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव। एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा॥ ~~ ~~

importance of war by Shree Krishna from Bhagwat Geeta _ श्री कृष्णा ने बताई अर्जुन को युद्ध की क्या आवश्यकता

श्री कृष्णा ने बताई  अर्जुन को युद्ध की क्या आवश्यकता  स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।। अपने धर्मको देखकर भी तू भय कार नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहि क्योंकि क्षत्रियके लिये धर्मयुक्त युद्धसे बढकर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है। यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥ हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्गके द्वाररूप इस प्रकारके युद्धको भाग्यवान् क्षत्रियलोग ही पाते हैं। अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य सङ्ग्रामं न करिष्यसि। ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥ किन्त यदि तू इस धर्मयुक्त युद्धको नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्त होगा। अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्। सम्भावितस्य चाकीर्तिमरणादतिरिच्यते।। तथा सब लोग तेरी बहुत कालतक रहनेवाली अपकीर्तिका भी कथन करेंगे और माननीय पुरुषके लिये अपकीर्ति मरणसे भी बढ़कर है॥ भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा...