कृष्ण के प्रेम मे दीवानी मीराबाई मीराबाई, जोधपुर के राठौड़ रतन सिंह की इकलौती बेटी थीं. बचपन से ही उनका मन कृष्ण भक्ति में रम गया था. यौवन से लेकर मृत्यु तक उन्होंने कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना। इनका विवाह राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। कविता मीरा ने मूरत को जो सुलाया, तो नटखट जग के सो गया होगा ............ गोद के स्पर्श में मोद को पाकर, पाहन कोमल हो गया होगा............ मीरा ने प्रेम की बेल जो बोई, तो कान्हा भी अंकुर बो गया होगा ............ मीरा ने आँसू के मोती सजाए , तो कान्हा भी धागा पिरो गया होगा ............ फूलों में सांप को देख के माला में, धागे सी सांप को सी गई मीरा ............ राणा ने पियाला दिया विष का, और सोचा अभी के अभी गई मीरा ........... मीरा ने विष तो पिया ही नहीं, ऐसे मौत को मार के जी गई मीरा ........... कृष्ण के प्रेम का प्याला है ये , रणधार से प्यार को पी गई मीरा ........... राधा को कृष्ण की देह मिली, बिन देह के नेह निभा गई मीरा ........... बृज भूमि में कान्हा ने रास रचा, मरु भूम...
गोलोकधाम दर्शन गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् बहुत पहले की बात है - दानव, दैत्य, आसुर स्वभाव के मनुष्य और दुष्ट राजाओं के भार से अत्यन्त पीड़ित हो, पृथ्वी गौ का रूप धारण करके, अनाथ की भाँति रोती-बिलखती हुई अपनी आन्तरिक व्यथा निवेदन करने के लिए ब्रह्माजी की शरण में गई। उस समय उसका शरीर काँप रहा था। वहाँ उसकी कष्टकथा सुनकर ब्रह्माजी ने उसे धीरज बँधाया और तत्काल समस्त देवताओं तथा शिवजी को साथ लेकर वे भगवान नारायण के वैकुण्ठ धाम में गये। वहाँ जाकर ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु को प्रणाम करके अपना सारा अभिप्राय निवेदन किया। तब भगवान विष्णु ने कहा - ब्रह्मन्! साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही अगणित ब्रह्माण्डों के स्वामी, परमेश्वर, अखण्डस्वरूप तथा देवातीत हैं। उनकी लीलाएँ अनन्त एवं अनिर्वचनीय हैं। उनकी कृपा के बिना यह कार्य कदापि सिद्ध नहीं होगा, अतः तुम उन्हीं के अविनाशी एवं परम उज्जवल धाम में शीघ्र जाओं। श्रीब्रह्माजी बोले- प्रभो! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा भी परिपूर्णतम् तत्व है, यह मैं नहीं जानता। यदि कोई दूसरा भी आपसे उत्कृष्ट परमेश्वर है, तो ...
कैसे मनुष्य भगवन को प्रिय हैं अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहङ्कारसे रहित, सुख द:खोंकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है-वह मुझमें अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकानोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ जिससे कोई भी जीव उद्वेगको प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहीं होता; तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिसे रहित है-वह भक्त मुझको प्रिय है ॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ जो पुरुष आकांक्षासे रहित, बाहर-भीतर शुद्ध, चतुर, पक्षपातसे रहित और ...
Comments
Post a Comment
अधिक जानकारी के लिये कमेंट्स करें