origin of Govardhan _ गोवर्धन पर्वत की उत्पत्ति
गिरिराज गोवर्धन की उत्पत्ति
नन्दजीने पूछा-
महाप्राज्ञ सन्नन्दजी! आप सर्वज्ञ और बहुश्रुत हैं, मैंने आपके मुखसे व्रजमण्डलके माहात्म्यका वर्णन सुना। अब 'गोवर्धन' नामसे प्रसिद्ध जो पर्वत है, उसकी उत्पत्ति कैसे हुई–यह मुझे बताइये। इस गिरिश्रेष्ठ गोवर्धनको लोग 'गिरिराज' क्यों कहते हैं? यह साक्षात् यमुना नदी किस लोकसे यहाँ आयी है? उसका माहात्म्य भी मुझसे कहिये; क्योंकि आप ज्ञानियोंके शिरोमणि हैं।
सन्नन्दजी बोले-
एक समयकी बात है, हस्तिनापुरमें महाराज पाण्डुने धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीभीष्मजीसे ऐसा ही प्रश्न किया था। उनके उस प्रश्नको और भीष्मजीद्वारा दिये गये उत्तरको अन्य बहुत-से लोग भी सुन रहे थे। (उस समय भीष्मजीने जो उत्तर दिया, वही मैं यहाँ सुना रहा हूँ-)
साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण, जो असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति, गोलोकके नाथ और सब कुछ करने में समर्थ हैं, जब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये स्वयं इस भूतलपर पधारने लगे, तब उन जनार्दन देवने अपनी प्राणवल्लभा राधासे कहा-प्रिये! तुम मेरे वियोगसे भयभीत रहती हो, अतः भीरु! तुम भी भूतलपर चलो' ॥
श्रीराधाजी बोलीं-प्राणनाथ! जहाँ वृन्दावन नहीं है, जहाँ यह यमुना नदी नहीं है तथा जहाँ गोवर्धन पर्वत नहीं है, वहाँ मेरे मनको सुख नहीं मिल सकता॥
सन्नन्दजी कहते हैं-
नन्दराज! श्रीराधाकी यह बात सुनकर स्वयं श्रीहरिने अपने धामसे चौरासी कोस विस्तृत भूमि, गोवर्धन पर्वत और यमुना नदीको भूतलपर भेजा। उस समय चौरासी कोस विस्तारवाली गोलोक की सर्वलोकवन्दिता भूमि चौबीस वनोंके साथ यहाँ आयी। गोवर्धन पर्वतने भारतवर्षसे पश्चिम दिशामें शाल्मलीद्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नीके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। उस अवसरपर देवताओंने गोवर्धनके ऊपर फूल बरसाये। हिमालय और सुमेरु आदि समस्त पर्वतोंने वहाँ आकर प्रणाम और परिक्रमा करके गोवर्धनका विधिवत् पूजन किया। पूजनके पश्चात् उन महान् पर्वतोंने उसकी स्तुति प्रारम्भ की॥
पर्वत बोले-
तुम साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके गोलोकधाममें, जहाँ दिव्य गौओंका समुदाय निवास करता है तथा गोपाल एवं गोपसुन्दरियाँ शोभा पाती हैं, सुशोभित होते हो। तुम्ही 'गोवर्धन' नामसे वृन्दावनमें विराजते हो, इस समय तुम्ही हम समस्त पर्वतोंमें 'गिरिराज' हो। तुम वृन्दावनकी गोदमें समोद निवास करनेवाले, गोलोकके मुकुटमणि हो तथा पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके हाथोंमें किसी विशिष्ट अवसरपर छत्रके समान शोभा पाते हो। तुम गोवर्धनको हमारा सादर नमस्कार है॥
सन्नन्दजी कहते हैं-
नन्दराज! जब इस प्रकार स्तुति करके सब पर्वत अपने-अपने स्थानपर चले गये, तभीसे यह गिरिश्रेष्ठ गोवर्धन साक्षात् 'गिरिराज' कहलाने लगा है।
Comments
Post a Comment
अधिक जानकारी के लिये कमेंट्स करें