varn dharm and its characteristic _ वर्ण धर्म क्या है और उसके लक्षण
नारद जी द्वारा वर्ण धर्म और उसके लक्षण
की व्याख्या
अध्ययन, अध्यापन, दान लेना, दान देना और यज्ञ करना, यज्ञ कराना-ये छ: कर्म ब्राह्मण के हैं.
क्षत्रिय को दान नहीं लेना चाहिये। प्रजाकी रक्षा करनेवाले क्षत्रियका जीवन-निर्वाह ब्राह्मणके सिवा और सबसे यथायोग्य कर तथा दण्ड (जुर्माना) आदिके द्वारा होता है॥
वैश्य को सर्वदा ब्राह्मणवंशका अनुयायी रहकर, गोरक्षा, कृषि एवं व्यापारके द्वारा अपनी जीविका चलानी चाहिये।
शूद्रका धर्म है द्विजातियोंकी सेवा। उसकी जीविका का निर्वाह उसका स्वामी करता है॥
ब्राह्मणके जीवन-निर्वाहके साधन चार प्रकारके हैं- वार्ता, शालीन, यायावर और शिलोञ्छन । इनमें से पीछे-पीछे की वृत्तियाँ अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हैं॥
निम्न वर्ण का पुरुष बिना आपत्तिकालक उत्तम वर्णकी वृत्तियोंका अवलम्बन न करे। क्षत्रिय दान लेना छोड़कर ब्राह्मणकी शेष पाँचों वृत्तियांका अवलम्बन ले सकता है। आपत्तिकालमें सभी सब वृत्तियोंको स्वीकार कर सकते हैं॥
ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृत-इनमेसे किसी भी वृत्तिका आश्रय ले, परन्तु श्वानवृत्तिका अवलम्बन कभी न करे॥
बाजारमें पड़े हुए अन्न (उञ्छ) तथा खेतोंमें पड़े हुए अन्न (शिल)का बीनकर 'शिलोञ्छ' वत्तिसे जीविका निर्वाह करना 'ऋत' है।
बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसी अयाचित (शालीन) वृत्तिके द्वारा जीवन-निर्वाह करना 'अमृत' है।
नित्य माँगकर लाना अर्थात् 'यायावर' वृत्तिके द्वारा जीवन-यापन करना 'मृत' है। कृषि आदिके द्वारा 'वार्ता' वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करना 'प्रमृत' है॥
वाणिज्य 'सत्यानत' है और निम्नवर्णकी सेवा करना 'श्वानवृत्ति' है।
ब्राह्मण और क्षत्रियको इस अन्तिम निन्दित वृत्तिका कभी आश्रय नहीं लेना चाहिये। क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय और क्षत्रिय (राजा) सर्वदेवमय है॥
शम, दम, तप, शौच, सन्तोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, दया, भगवत्परायणता और सत्य–ये ब्राह्मणके लक्षण हैं ॥
युद्ध में उत्साह, वीरता, धीरता, तेजस्विता, त्याग, मनोजय, क्षमा, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति, अनुग्रह और प्रजाकी रक्षा करना-ये क्षत्रियके लक्षण हैं॥
देवता, गुरु और भगवान्के प्रति भक्ति, अर्थ, धर्म और काम-इन तीनों पुरुषार्थों की रक्षा करना; आस्तिकता, उद्योगशीलता और व्यावहारिक निपुणताये वैश्यके लक्षण हैं॥
उच्च वर्गों के सामने विनम्र रहना, पवित्रता, स्वामीकी निष्कपट सेवा, वैदिक मन्त्रोंसे रहित यज्ञ, चोरी न करना, सत्य तथा गौ, ब्राह्मणोंकी रक्षा करना-ये शूद्रके लक्षण हैं॥
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