Shree Balram ji ki Stuti _ श्रीबलरामजी की स्तुति
सत्यवतीनन्दन व्यासजी द्वारा श्रीशेषजी के अवतार श्रीबलरामजी की स्तुति
इस स्तुति का निम्न महत्व है-
‘‘ जो इस जगत् में सदा ही इस स्तवन का पाठ करेगा, वह श्रीहरि के परमपद को प्राप्त होगा। संसार में उसे शत्रुओं का संहार करने वाला सम्पूर्ण बल प्राप्त होगा। उसकी सदा जय होगी और वह प्रचुर धन का स्वामी होगा।’’
-ः स्तुति:-
श्रीव्यास उवाच-
देवाधिदेव भगवन् कामपाल नमोऽस्तु ते। नमोऽनन्ताय शेषाय साक्षाद्रामाय ते नमः।।
धराधराय पूर्णाय स्वधाम्ने सीरपाणये। सहस्त्रशिरे नित्यं नमः संकर्षणाय ते।।
रेवतीरमण त्वं वै बलदेवोऽच्युताग्रजः। हलायुधः प्रलम्बघ्नः पाहि मां पुरूषोत्तम।।
बलाय बलभद्राय तालाड्.काय नमो नमः। नीलाम्बराय गौराय रौहिणेयाय ते नमः।।
धेनुकारिर्मुष्टिकारिः कुम्भाण्डारिस्त्वमेव हि। रुक्मयरिः कूपकर्णारिः कूटारिर्बल्वलान्तकः।।
कालिन्दीभेदनोऽसि त्वं हस्तिनापुरकर्षकः। द्विविदारिर्यादवेन्द्रो व्रजमण्डलमण्डलः।।
कंसभ्रातृप्रहन्तासि तीर्थयात्राकरः प्रभुः। दुर्योधनगुरुः साक्षात् पाहि पाहि प्र्रभो जगत्।।
जय जयाच्युत देव परात्पर स्वयमनन्त दिगन्तगतश्रुत।
सुरमुनीन्द्रफणीन्द्रवराय ते मुसलिने बलिने हलिने नमः।।
इह पठेत्सततं स्तवनं तु यः स तु हरेः परमं पदमाव्रजेत्।
जगति सर्वबलं त्वरिमर्दनं भवति तस्य जयः स्वधनं धनम्।।
-ः भावार्थ:-
श्रीव्यासजी बोले-
भगवन्! आप देवताओं के भी अधिदेवता और सबका मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है। आप साक्षात् अनन्तदेव शेषनाग हैं, बलराम हैं; आपको मेरा प्रणाम है। आप धरनीधर, पूर्णस्वरूप, स्वयंप्रकाश, हाथ में हल धारण करने वाले, सहस्त्र मस्तकों से सुशोभित तथा संकर्षणदेव हैं, आपको नमस्कार है। रेवतीरमण! आप ही बलदेव एवं श्रीकृष्ण के अग्रज हैं। हलायुध एवं प्रलम्बासुर के नाशक हैं। पुरुषोत्तम! आप मेरी रक्षा कीजिए। आप बल, बलभद्र एवं ताल के चिन्ह से युक्त ध्वजा धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है। आप नीलवस्त्रधारी, गौरवर्ण तथा रोहिणी के सुपुत्र हैं, आपको मेरा प्रणाम है। आप ही धेनुक, मुष्टिक, कुम्भाण्ड, रुक्मी, कूपकर्ण, कूट बल्बल के शत्रु हैं। कालिन्दी की धारा को मोड़ने वाले और हस्तिनापुर को गंगा की ओर आकर्षित करने वाले आप ही हैं। आप द्विविद के विनाशक, यादवों के स्वामी तथा व्रजमण्डल के भूषण हैं। आप कंस के भाइयों का वध करने वाले तथा तीर्थयात्रा करने वाले प्रभु हैं। दुर्योधन के गुरु भी साक्षात् आप ही हैं। प्रभो! जगत् की रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले परात्पर देवता साक्षात् अनन्त! आपकी जय हो, जय हो। आपका सुयश समस्त दिगन्त में व्याप्त है। आप सुरेन्द्र, मुनीन्द्र और फणीन्द्रों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मुसलधारी, हलधर तथा बलवान् हैं, आपको नमस्कार है।
जो इस जगत् में सदा ही इस स्तवन का पाठ करेगा, वह श्रीहरि के परमपद को प्राप्त होगा। संसार में उसे शत्रुओं का संहार करने वाला सम्पूर्ण बल प्राप्त होगा। उसकी सदा जय होगी और वह प्रचुर धन का स्वामी होगा।
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