patni ka dharm kya hai _ पत्नी का धर्म क्या है

नारद जी के द्वारा पत्नी धर्म ( स्त्री धर्म ) के लक्षण एवं उसकी व्याख्या 

पतिकी सेवा करना, उसके अनुकूल रहना, पतिके सम्बन्धियों को प्रसन्न रखना और सर्वदा पतिके नियमोंकी रक्षा करना—ये पतिको ही ईश्वर माननेवाली पतिवता स्त्रियोंके धर्म हैं॥
साध्वी स्त्रीको चाहिये कि झाडने-बुहारने, लीपने तथा चौक पूरने आदिसे घरको और मनोहर वस्त्राभूषणोंसे अपने शरीरको अलंकृत रखे। सामग्रियोंको साफ-सुथरी रखे ॥
अपने पतिदेवकी छोटी-बड़ी इच्छाओंको समयके अनुसार पूर्ण करे। विनय, इन्द्रिय-संयम, सत्य एवं प्रिय वचनों से प्रेमपूर्वक पतिदेवकी सेवा करे॥
जो कुछ मिल जाय, उसीमें सन्तुष्ट रहे. किसी भी वस्तुके लिये ललचावे नहीं। सभी कार्यों में चतुर एवं धर्मज्ञ हो। सत्य और प्रिय बोले।
अपने कर्तव्य सावधान रहे। पवित्रता और प्रेमसे परिपूर्ण रहकर यदि पति पतित न हो तो, उसका सहवास करे॥
जो लक्ष्मीजीके समान पतिपरायणा होकर अपने पतिकी उसे साक्षात् भगवान्का स्वरूप समझकर सेवा करती है, उसके पतिदेव वैकुण्ठलोकमें भगवत्सारूप्यको प्राप्त होते हैं और वह लक्ष्मीजीके समान उनके साथ आनन्दित होती है॥



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