Narad ji ki Katha - नारदजी की पूर्वजन्म की कथा
देवर्षि नारद ने श्रीव्यास जी को सुनाया अपने पूर्वजन्म का वृत्तान्त
नारदजी ने कहा-
मुने! पिछले कल्प में अपने पूर्वजीवन में मैं वेदवादी ब्राह्मणों की एक दासी का लड़का था। वे योगी वर्षाऋतु में एक स्थान पर चातुर्मास्य कर रहे थे। बचपन में ही मैं उनकी सेवा में नियुक्त कर दियरा गया था।
मैं यद्यपि बालक था, फिर भी किसी प्रकार की चंचलता नहीं करता था। खेल-कूद से दूर रहता था और आज्ञानुसार उनकी सेवा करता था।
उनकी अनुमति प्राप्त करके बर्तनों में लगा हुआ प्रसाद मैं खा लिया करता था। इससे मेरे सारे पाप धुल गये। इस प्रकार उनकी सेवा करते करते मेरा हृदय शुद्ध हो गया और भजन-पूजन में मेरी रूचि हो गयी।
उन महात्माओं के अनुग्रह से मैं प्रतिदिन श्रीकृष्ण की मनोहर कथाएँ सुना करता। श्रद्धापूर्वक एक-एक पद श्रवण करते-करते प्रियकीर्ति भगवान् में मेरी रूचि हो गयी।
तब उन मनोहरकीर्ति प्रभु में मेरी बुद्धि भी निश्चल हो गयी। उस बुद्धि से मैं इस सम्पूर्ण सत् और असत् जगत को अपने परब्रह्मस्वरूप आत्मा में कल्पित देखने लगा।अब चित्त के रजोगुण और तमोगुण को नाश करने वाली भक्ति का मेरे हृदय में प्रादुर्भाव हो गया।
उन दीनवत्सल महात्माओं ने जाते समय कृपा करके मुझे उस गुह्यतम ज्ञान का उपदेश दिया, जिसका उपदेश स्वयं भगवान् ने दपने श्रीमुख से किया है। उस उपदेश से ही जगत के निर्माता भगवान् श्रीकृष्ण की माया के प्रभाव को मैं जान सका, जिसके जान लेने पर उनके परमपद की प्राप्ति हो जाती है।
श्रीव्यासजी ने पूछा-
नारदजी! जब आपको ज्ञानोपदेश करने वाले महात्मागण चले गये, आपने क्या किया? उस समय तो आपकी अवस्था बहुत छोटी थी।
नारदजी ने कहा-
मैं अपनी माँ का इकलौता लड़का था। एक तो वह स्त्री थी, दूसरे मूढ़ और तीसरे दासी थी। मुझे भी उसके सिवा और कोई सहारा नहीं था।
मैं अपनी माँ के स्नेहबन्धन में बँधकर उस ब्राह्मण बस्ती में ही रहा। मेरी अवस्था केवल पाँच वर्ष की थी। मुझे दिशा, देश और काल के सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञान नहीं था।
एक दिन की बात है, मेरी माँ गौ दुहने के लिए रात के समय घर से बाहर निकली। रास्ते में उस बेचारी को एक साँप डस गया।मैेंने समझा, भक्तों का मंगल चाहने वाले भगवान् का यह भी एक अनुग्रह है। इसके बाद मैं उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा।
डस ओर मार्ग में मुझे अनेकों धन-धान्य से सम्पन्न देश, नगर, गाँव, नदी और पर्वतों के पटवर्ती पड़ाव, वाटिकाएँ, वन-उपवन और रंग-बिरंगी धातुओं से युक्त विचित्र पर्वत दिखायी पड़े।
मैं अकेला ही था। इतना लम्बा मार्ग तय करने पर मैने एक घोर गहन जंगल देखा। वह साँप, उल्लू, स्यार, आदि भयंकर जीवोें का घर था। देखने में बड़ा भयावना लगता था।
चलते-चलते मेरा शरीर और इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं। मुझे बड़े जार की प्यास लगी, भूखा तो था ही। वहाँ एक नदी मिली। उसके कुण्ड में मैंने स्नान, जलपान और आचमन किया।
उस वन में एक पीपल के नाचे आसन लगाकर मैं बैठ गया। उन महात्माओं से जैसा मैंने सुना था, हृदय में रहने वाले परमात्मा के उसी स्वरूप का मैं मन नही मन ध्यान करने लगा।
भक्तिभाव से वशीकृत चित्त द्वारा भगवान के चरण-कमलों का ध्यान करते ही भगवत् प्राप्ति की उत्कट लालसा से मेरे नेत्रों में आँसू छलछला आये और हृदय में धीरे-धीरे भगवान प्रकट हो गये।
व्यासजी! उस समय प्रेमभाव के कारण मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा, हृदय अत्यन्त शान्त और शीतल हो गया। उस आनन्द की बाढ़ में मैं ऐसा डूब गया कि मुझे अपना और ध्येय वस्तु का तनिक भी भान न रहा।
भगवान का वह रूप समस्त शोकों का नाश करने वाला और मन के लिए अत्यन्त लुभावना था। सहसा उसे न देख मैं बहुत ही विकल हो गया और अनमना-सा होकर आसन से उठ खड़ा हुआ।मैंने उस स्वरूप का दर्शन फिर करना चाहा किन्तु मन को हृदय में समाहित करके बार-बार चेष्टा करने पर भी मैं उसे देख नहीं सका।
इस प्रकार निर्जन वन में मुझे प्रयत्न करते देख स्वयं भगवान ने बड़ी गंभीर और मधुर वाणी से मेरे शोक को शान्त करते हुए कहा-
खेद है कि इस जन्म में तुम मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे। जिनकी वासनाएँ पूर्णतया शान्त नहीं हो गयीं हैं, उन अधकचरे योगियों को मेरा दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है।
हे निष्पाप बालक! तुम्हारे हृदय में मुझे प्राप्त करने की लालसा जाग्रत करने के लिए ही मैंने तुम्हें एक बार अपने रूप की झलक दिखायी है। अल्पकालीन संतसेवा से ही तुम्हारी चित्तवृत्ति मुझमें स्थिर हो गयी है। अब तुम इस प्राकृतमलिन शरीर को छोड़कर मेरे पार्षद हो जाओंगे। मुझे प्राप्त करने का तुम्हारा यह दृढ़ निश्चय कभी किसी प्रकार नहीं टूटेगा। समस्त सृष्टि का प्रलय हो जाने पर भी मेरी कृपा से तुम्हें मेरी स्मृति बनी रहेगी।
आकाश के समान अव्यक्त सर्वशक्तिमान परमात्मा इतना कहकर चुप हो गयें। उनकी इस कृपा का अनुभव करके मैंने उन्हें प्रणाम किया।अब मैं आनन्द से काल की प्रतीक्षा करता हुआ पृथ्वी पर विचरने लगा।
व्यासजी! इस प्रकार भगवान की कृपा से मेरा हृदय शुद्ध हो गया, आसक्ति मिट गयी और मैं श्रीकृष्णपरायण हो गया। कुछ समय बाद अपने समय पर मेरी मृत्यु आ गयी और मेरा पंचभौतिक शरीर नष्ट हो गया।
कल्प के अन्त में जिस समय भगवान नारायण प्रलय-कालीन-समुद्र में शयन करते हैं, उस समय उनके हृदय में शयन करने कर इच्छा से इस सारी सृष्टि को समेटकर ब्रह्माजी जब प्रवेश करने लगे, तब उनके श्वास के साथ मैं भी उनके हृदय में प्रवेश कर गया।
एक सहस्त्र चतुर्युगी बीत जाने पर जब ब्रह्मा जागे ओर उन्होंने सृष्टि करने कर इच्छा की, तब उनकी इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मैं भी प्रकट हो गया।
तभी से मैं भगवान् की कृपा से वैकुण्ठादि और तीनों लोकों में बाहर और भीतर बिना रोक-टोक विचरण किया करता हूँ। मेरे जीवन का व्रत भगवत् भजन अखण्डरूप से चलता रहता है।
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