Sudama Charitra - सुदामा चरित्र by नरोत्तमदास (Narottamdas)





सुदामा-चरित्र

दोहा-
विप्र सुदामा बसत हो, सदा आपने धाम।
भीख माँगि भोजन करें, हिये जपत हरि नाम।। 1 ।।
ताकी घरनी पतिव्रता, गहै वेद की रीति।
सजल सुसील सबद्धि अति, पति सेवा सौं प्रीति।। 2 ।।
कहो सुदामा एक दिन, कृष्ण हमारे मित्र।
करत रहति उपदेश तिय, ऐसो परम विचित्र।। 3 ।।

सुदामा की पत्नी कहती है-
सवैया-
लोचन कमल दुख मोचन तिलक भाल स्त्रबननि कुण्डल मुकुट धरे माथ है।
ओढ़े पीत बसन कर में बैजयंती माल संख चक्र गदा और पह्म लिये हाथ हैं।।
कहत नरोत्तम संदीपनि गुरु के पास , तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं।
द्वारिका के गए हरि दारिद हरेंगे पिय, द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं।।

सुदामा कहते हैं-
सवैया-
सिच्छक हौं सिगरे जब को तिय, ताको कहा अब देति है सिच्छा।
जे तप के परलोक सुधारत, संपति की तिनके नहिं इच्छा।।
मेरे हिय के पद पंकज बार हजार लै देख परीक्षा।
औरत को धन चाहिए बावरि वामन को धन केवल भिच्छा।।

सुदामा की पत्नी कहती है-
सवैया-
कोदा सवाँ जुरतो भारि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती।
सीत वितीत कियो सिसयातहि, हों हठती पैं तुम्हें न हठौती।।
जो जननी न हतू हरि सांे , तुम्हें काहे को द्वारके पेलि पठौती।
या घर तें न या कब पय, टूटो तथा अरु फूटी कठौती।।

सुदामा कहते हैं-
सवैया-
छांडि सबै जक तीति लगी बक आठहु जाम यहै जक ठानी।
जतहिं देहें लदाय लढ़ा भरि लैहों लदाय यहैं जिय जानी।।
पावैं कहाँ ते अटारी अटा जिनके विधि दीन्हीं है टूटी सी छानी।
जो पै दरिद्र लिखो है ललाट तो काहू पै मेटि न जात अजानी।।

सुदामा की पत्नी कहती है-
कवित्त-
विप्र के भगत हरि जगत विदित बंधु,
लेत सब ही की सुधि ऐसे महादानी हैं।
पढ़े एक चटसार कहीं तुम कैयो बार,
लोचन अपार वै तुम्हें न पहिचानि हैं।।
एक दीनबंधु कृपासिंधु फेरि गुरुबंधु,
तुम सम कौन दीन जाको जिय जानि है।
नाम लेत चैगुनी गए ते द्वार सौगुनी सों,
देखत सहस्त्रगुनी प्रीति प्रभु मानि हैं।।

सुदामा कहते हैं-
सवैया-
द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहू जू, आठहु जाम यहै जक तेरे।
जौ न कहो करिए जो बड़ोे दुख जैए कहाँ अपनी गति हेरे।।
द्वार खरे प्रभु के छरिया, तहँ भूपति जान न पावत नेरे।
पाँच सुपारी ते देखु विचारिकैं, भेंट को चारि न चाउर मेरे।।

यह सुन के सुदामा की पत्नी पडोसन के पास गईं -
दोहा-
यह सुनिके तब ब्रह्मानी, गई परोसिनी पास।
पाव सेर चाउर लिए, आई संहित हुलास।।
सिद्धि करि गनपति सुमिरि, बांधि दुपटिया खूँट।
माँगत खात चले तहाँ, मारग बाली बूट।।

जब सुदामा द्वारिका पहुँच गयें-
कवित्त-
दीठि चकचैंधि गई देखते सुबनमई,
एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं।
पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू सौं न करें बात,
देवता से बैठे सब साधि साधि मौन हैं।।

द्वारपाल व सुदामा की बीच वार्ता -
कवित्त-
देखत सुदामें धाय पौरजन गहे पाय,
कृपा करि कहौ विप्र कहाँ कीन्ह गौन हैं।
धीरज अधीर के हरन पर पीर के,
बताओं बलवीर के महल यहाँ कौन है।।

द्वारपालक ने श्रीकृष्ण से कहा-
सवैया-
सीस पगा न झगा तन पै, प्रभु जानि को आहि बसैं केहि ग्रामा।
धोती फटी सी लटी दुपटी, अरुपाय उपानह की नहिं सामा।।
द्वार खरौ द्विज दुर्बल एक, रह्यौ चकि सो वसुधा अभिरामा।
पूछत दीन दयाल को धाम, बतावत आपनों नाम सुदामा।।

इतना सुनते ही श्रीकृष्ण सुदामा को लेने उसके पास नंगे पैर दौड़ते हुए गये और अपने महल लेकर आये-


कवित्त-
बोल्यौ द्वारपालक सुदामा नाम पांडे सुनि,
छाँड़े राज-काज ऐसे जी की गति जाने को।
द्वारिका के नाथ हाय जोरि घय गहे पाय,
भेंट लपटाय करि ऐसे दुख सानै को।।
नैन दोऊ जल भरि पूछत कुसल हरि,
विप्र बोल्यौ बिपदा में मोहि पहिचाने को।
जैसी तुम करी तैसी करै को कृपा के सिंधु,
ऐसी प्रीति दीनबंधु दीनन को माने को।।

महल में सुदामा का सत्कार-
सवैया-
ऐसे बेहाल बेवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोए।
हाय महादुख पायो सखा तुम आए इतै न कितै दिन खोए।।
देखि सुदामा की दीन दसा करुना करिकै करुनानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयौ नहिं नैनन के जल सों पग धोए।।



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